जब भी अमेरिका H-1B वीज़ा को लेकर कड़े नियम लाता है, भारत के आईटी प्रोफेशनल्स और कंपनियों में एक हलचल सी मच जाती है। लेकिन इस बार हालात कुछ अलग हैं। ट्रंप प्रशासन द्वारा वीज़ा शुल्क को अचानक 100,000 डॉलर तक बढ़ाना न केवल भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए बल्कि अमेरिकी कंपनियों के लिए भी एक बड़ा झटका है।
मैंने खुद कई आईटी कंपनियों के मैनेजरों से बातचीत की है और लगभग सभी की राय यही रही कि अब “Global Capability Centres” यानी GCCs भारत में और तेजी से बढ़ेंगे।
अमेरिका की रणनीति और भारत की भूमिका
अमेरिका लंबे समय से कुशल विदेशी कर्मचारियों पर निर्भर रहा है। लेकिन अब ट्रंप के कदम ने कंपनियों को मजबूर कर दिया है कि वे भारत जैसे देशों में अपने बड़े-बड़े ऑपरेशन सेंटर खड़े करें।
भारत में पहले ही 1,700 से ज्यादा GCCs काम कर रहे हैं और 2030 तक ये संख्या 2,200 से अधिक हो सकती है।
GCCs: सिर्फ बैकऑफिस नहीं, इनोवेशन का केंद्र
पहले इन्हें सिर्फ “टेक सपोर्ट” समझा जाता था। लेकिन आज यही GCCs ड्रग डिस्कवरी, लग्जरी कार डैशबोर्ड डिजाइन, फाइनेंस रिसर्च, साइबर सिक्योरिटी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी हाई-वैल्यू गतिविधियों का केंद्र बन चुके हैं।
डेलॉइट इंडिया के इंडस्ट्री लीडर रोहन लोबो का कहना है, “GCCs अब कंपनियों के लिए इन-हाउस इंजन की तरह काम कर रहे हैं। कई अमेरिकी कंपनियां पहले से ही अपनी स्ट्रैटेजी बदल रही हैं।”
कंपनियों का बदलता माइंडसेट
फेडएक्स, टारगेट, ब्रिस्टल-मेयर्स स्क्विब और लोव्स जैसी दिग्गज कंपनियों ने भारत में अपने GCCs सेटअप कर लिए हैं।
ललित आहूजा, जो ANSR कंपनी के फाउंडर हैं, कहते हैं,
“यह बदलाव गोल्ड रश जैसा है। कंपनियां तेजी से भारत में निवेश कर रही हैं और यह सिलसिला आगे और बढ़ेगा।”
भारत के लिए क्या मायने?
भारत की 283 अरब डॉलर की आईटी इंडस्ट्री, जो देश के GDP में लगभग 8% योगदान देती है, अब और मजबूती पा सकती है।
अगर अमेरिका का HIRE Act लागू हुआ और 25% टैक्स आउटसोर्सिंग पर लगा, तो चुनौती जरूर बढ़ेगी। लेकिन GCCs के तेजी से विस्तार से भारत को एक नया स्ट्रैटेजिक बढ़त मिल सकती है।
ग्लोबल कंपनियों के विकल्प
कुछ अमेरिकी कंपनियां मेक्सिको, कोलंबिया या कनाडा में भी सेंटर खोलने पर विचार कर रही हैं। लेकिन भाषा, टैलेंट और लागत के लिहाज से भारत उनके लिए सबसे मजबूत विकल्प बन रहा है।
ट्रंप प्रशासन का वीज़ा कड़ा करना भारत के लिए अप्रत्याशित रूप से अवसर लेकर आया है। भारतीय प्रतिभा, तेज़ी से विकसित हो रहे GCCs और तकनीकी इनोवेशन का मेल भारत को ग्लोबल टेक हब बनाने की राह पर है।
भले ही चुनौतियां बनी रहें, लेकिन अमेरिकी कंपनियों की बढ़ती निर्भरता भारत को अगले दशक में “Global Capability Centres” की राजधानी बना सकती है।
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